NIOS CLASS 12 इतिहास अध्याय 15 महात्मा गांधी और राष्ट्रवादी आंदोलन

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NIOS CLASS 12 इतिहास अध्याय 15 महात्मा गांधी और राष्ट्रवादी आंदोलन

 

महात्मा गांधी अपने युग के महान नेता थे ।  उन्होंने सत्य अहिंसा और सत्याग्रह के आधार पर सन 1920 से 1947 तक राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया सारे देश में राजनीतिक चेतना जागृत की और कांग्रेस के राष्ट्रीय आंदोलन को जन्म जन आंदोलन के रूप में परिवर्तित कर दिया अतः अंत में उनके प्रयासों से 15 अगस्त 1947 ई को भारत को आजादी मिली इसलिए उन्हें राष्ट्रपिता के नाम से पुकारा जाता है| इस दौरान उन्होंने राजनीति के साथ-साथ सामाजिक आर्थिक शैक्षिक और धार्मिक आदि सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया इसलिए यह युग इतिहास में गांधी युग 1920 से 1947 ई तक के नाम से प्रसिद्ध है।

 

गांधी जी का संक्षिप्त जीवन परिचय-

 

महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था । उनका जन्म 2 अक्टूबर 1969 ई में काठियावाड़ जिले के पोरबंदर नगर में हुआ था । उनके पिता का नाम करमचंद गांधी था, जो राजकोट रियासत के दीवान थे एवं माता का नाम पुतलीबाई था| जो धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी । 13 वर्ष की आयु में गांधी जी का विवाह कस्तूरबा गांधी से हो गया। भारत में स्नातक की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात सन 1888 में बैरिस्टर की शिक्षा प्राप्त करने के लिए वे इंग्लैंड के इंग्लैंड जाने से पहले उन्होंने अपनी माता को यह कहा कि वह स्त्री का गण नहीं करेंगे एवं मांस और शराब का प्रयोग नहीं करेंगे । उन्होंने अपने इस वचन को भी भली प्रकार निभाया सन 1891 में बैरिस्टर की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात गांधी जी भारत लौट आए और मुंबई में वकालत शुरू कर दी ।

 

 

गांधी जी  दक्षिण अफ्रीका में

 

 

सन 1893 गांधी जी को एक मुकदमे की पर भी के लिए दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा वहां पर अंग्रेज रंगवेद की नीति के आधार पर भारतीयों से गिरना करते थे| तथा उनके साथ अपमानजनक व्यवहार करते थे वह भारतीयों को कुली काला आदमी या टॉय आदि नाम से पुकारते थे अफ्रीका में भारतीयों का सम्मान नहीं होता था| उनका व्यक्तिगत संपत्ति रखने का अधिकार नहीं था उन्होंने यह देखा कि भारतीयों को रात के 9:00 के बाद बाजार में घूमने नहीं दिया जाता था| गांधी जी ने इंग्लैंड के राज्य अधिकारियों के पास एक प्रार्थना पत्र भेजा जिसमें गांधी जी के साथ किए जाने वाले अपमानजनक व्यवहार की आलोचना की गई इसके अतिरिक्त का लिखने इंडियन ओपिनियन नामक समाचार पत्र प्रकाशित किया ताकि इसके द्वारा भारतीयों के पक्ष में आवश्यक प्रचार किया जा सके |

गांधी जी ने 20 वर्ष 1893 से 1914 ई तक हिंसात्मक तरीके से संघर्ष किया उनके प्रयासों के फलस्वरूप अफ्रीका की सरकार ने भारतीयों के विरुद्ध बने हुए अपमानजनक कानून को वापस ले लिया और भारतीयों पर से कई तरह के प्रबंध को हटा दिया गया | गांधी जी को इस सम्मान सफलता के परिणाम स्वरुप ख्याति प्राप्त हुई और उनकी भारतवर्ष में लोकप्रियता बढ़ गई अफ्रीका में गांधी जी के कार्यों के बारे में गोखले ने ने कहा था दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों की सुरक्षा निशान दे महात्मा गांधी जी ने आरंभ की बिना किसी स्वार्थी या इच्छा के उन्होंने भारत के लिए महान संघर्ष किया जिसके लिए भारत उनका आभारी है।

 

 

गांधी जी का भारत में आगमन ‌

 

सन 1915 में गांधी जी अफ्रीका से भारत आ गए उन्होंने अहमदाबाद के निकट साबरमती ग्राम में अपना आश्रम बना लिया इसके पश्चात हुए जनहित कार्यों में व्यस्त हो गए गांधी जी ने कहा था मैं भारत में उसे तरीके से को अपनाना चाहता हूं जिसका प्रयोग मैं दक्षिण अफ्रीका में किया था और मैं यह जानना चाहता हूं कि भारत में उसका प्रयोग कहां तक संभव है| गांधी जी ने सत्याग्रह करके भारतीयों को बलपूर्वक ब्रिटिश उपनिवेशों में मजदूरी के लिए ले जाने की पद्धति को बंद करवाया सन 1917 में बिहार के चंपारण जिले के किसानों को ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों से मुक्ति दिलाए सन 1919 में महात्मा गांधी ने मीत मजदूरों की मांगों के समर्थन में आमरण अनशन करके उनकी मांगे पूरी करवाई इस समय तक कांग्रेस पर गांधीजी का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ चुका था ।

 

 

गांधी जी ब्रिटिश सरकार के सहयोगी के रूप में

 

गांधी जी ब्रिटिश सरकार के सहयोगी के रूप में प्रसिद्ध हुए यद्यपि गांधी जी ने भारतीय राजनीति में भाग लेना प्रारंभ कर दिया था । तथापि वे गोखले के संवैधानिक सुधार और सरकार को सहयोग देने की नीति से प्रभावित थे जिस समय गांधीजी भारत लौटे उसे समय प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था गांधीजी इस युद्ध में सरकार की सहायता देने के पक्ष में थे | अतः उन्हें स्थान स्थान पर भाषण देकर अपने देशवासियों को भारत में रह रहे अंग्रेजों की सहायता करने की अपील की गई इस प्रकार विश्व युद्ध के दौरान गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार की सराहनीय सेवाएं की सूट के अनुसार गांधी जी ब्रिटिश साम्राज्य की नागरिकता में विश्वास करते थे और उसमें कर भी अनुभव करते थे | इसलिए उन्होंने भारत सरकार को रंगरूटों की भर्ती तथा घायल व्यक्तियों की देखभाल के लिए अपनी सेवाएं भी अर्पित की प्रथम महायुद्ध में की गई सेवाओं के कारण सरकार ने उन्हें पदक भी दिया प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद अंग्रेजों ने भारत को स्वराज नहीं दिया | तब बी गांधीजी बराबर अंग्रेज सरकार के साथ सहयोग करते रहे सन 1919 के अधिनियम से सभी राष्ट्रवादी असंतुष्ट थे | परंतु गांधी जी ने अपने समाचार पत्र यंग इंडिया के 31 दिसंबर 1919 ई के अंक में लोगों में अपील की कि वह इस अधिनियम को क्रियान्वित होने में सरकार को सहयोग दें।

 

गांधी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन

 

सन 1919 के बाद कुछ ऐसी घटनाएं घटी की गांधी जी ने सरकार के साथ सहयोग करने का निश्चय किया और राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व अपने हाथ में ले लिया |  सन 1919 तक यह आंदोलन शिक्षित वर्ग तक ही सीमित रहा परंतु गांधी जी ने इसे जन आंदोलन का रूप दिया इस समय अंग्रेज सरकार भारतीय जनता पर बहुत अत्याचार कर रही थी इसलिए गांधी जी ने असहयोग आंदोलन प्रारंभ करने का निश्चय किया |

 

 

असहयोग आंदोलन (1920 – 1922)

 

आंदोलन के कारण –

गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन प्रारंभ करने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

 

1-रॉलेट एक्ट ( 21 मार्च 1919 ई)

 

असहयोग आंदोलन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण रोलेट एक्ट था अंग्रेज सरकार भारतीयों की राष्ट्रीय भावनाओं को कुचलना चाहती थी | इसलिए उन्होंने सन 1918 में न्यायाधीश रोलेट की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई जिसे क्रांतिकारियों को कुचलना के लिए उपाय बताने को कहा इस कमेटी के सुझाव पर जो बिल पारित किया गया वह रॉलेक्ट एक्ट के नाम से प्रसिद्ध है | इस दमनकारी कानून के अनुसार किसी भी व्यक्ति को बिना बताए बिना नोटिस दिए उसे पर मुकदमा चलाया जा सकता था जेल में चाहे जितनी भी समय तक बंदी बनाकर रखा जा सकता था अथवा गुप्त रूप से मुकदमा चलाकर दंडित भी किया जा सकता था |  यहां तक की किसी भी व्यक्ति पर संदेह मात्र होने पर उसे बंदी बनाया जा सकता था इस प्रकार इस कानून के द्वारा ब्रिटिश सरकार किसी भी बैंक गुना व्यक्ति को तंग कर सकती थी महात्मा गांधी के विरोध के बाद सरकार ने 21 मार्च 1919 ई को यह कानून लागू कर दिया |  गांधी जी के आह्वान पर सारे देश में इस कानून के विरोध में 6 अप्रैल 1919 ई को हड़ताल रखी गई और जुलूस निकाले गए दिल्ली में स्वामी श्रद्धानंद के नेतृत्व में जुलूस निकाला गया  | जब यूरोपीय सैनिकों ने गोली चलाने की धमकी दी तो उन्होंने अपनी नंगी छाती उनके सामने कर दी जुलूस के दिल्ली रेलवे स्टेशन के निकट पहुंचने पर गोली चला दी गई इस दुर्घटना में पांच व्यक्तियों के मारे जाने तथा कुछ अन्य व्यक्तियों के चोटिल होने की खबरें सामने आए |  लाहौर में भी गोलियां चली एवं पंजाब में उपद्र हुए इस समय गांधी जी दिल्ली आ रहे थे तो सरकार ने उनके दिल्ली एवं पंजाब में प्रवेश पर रोक लगा दी गांधी जी ने इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया तो पलवल हरियाणा में उन्हें गिरफ्तार करके वापस मुंबई भेज दिया गया |

 

2-जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल1919)

 

रॉलेट एक्ट का विरोध करने पर महात्मा गांधी और अमृतसर के दो लोकप्रिय नेताओं जिनमें डॉक्टर सत्यपाल तथा डॉक्टर सैफुद्दीन किचलू को गिरफ्तार करके अज्ञात स्थान पर भेज दिया गया जिससे अमृतसर में उत्तेजना फैल गई और भीड़ ने अपने नेताओं की रिहाई के लिए जिला मजिस्ट्रेट की कोठी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया सैनिकों के इनकार करने पर भी भीड़ आगे बढ़ती रही अतः उन पर गोली चला दी गई जिसे दो व्यक्ति मारे गए भीड़ में शहीद हुए व्यक्तियों को अपने कंधों पर डालकर जुलूस निकाला मार्ग में भीड़ ने पांच अंग्रेज अफसर की हत्या कर दी और भावनाओं में आग लगा दी 10 अप्रैल को अमृतसर नगर का शान सैनिक अधिकारियों को सौंप दिया गया ब्रिगेडियर जनरल आर्ट डायरेक्टर ने 12 अप्रैल को अमृतसर पहुंचकर लोगों को बंदी बनाना प्रारंभ कर दिया 13 अप्रैल 1919 ई को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक आमसभा आयोजित की गई इसका उद्देश्य सरकार कोई कुर्नीति की निंदा करना था इस आवाज में लगभग 25000 पुरुष स्त्रियों और बच्चे सम्मिलित हुए जनरल डायर ने इस सभा को गैर कानूनी घोषित कर दिया किंतु सभा पर प्रतिबंध लगाने पर नोटिस नगर में अच्छी तरह से नहीं घुमाया 13 अप्रैल 1919 में जनरल डायर सो भारतीयों और 50 अंग्रेज सैनिकों को लेकर जलियांवाला बाग पहुंच किंतु यह मशीन गन भाग के अंदर नहीं ले जा सका क्योंकि जलियांवाला बाग बहुत शंकर रास्ता था वह भी इतना तंग था कि उसमें मशीन मोटर को अंदर ले जाना बहुत कठिन था इसलिए उसने मोटर पर लगी हुई मशीन गन से बाग के दरवाजों को रोक लिया सभा की कार्यवाही शांतिपूर्वक चल रही थी इसमें गांधी जी डॉक्टर की जरूरत तथा सतपाल की रिहाई की मांग की जा रही थी तथा रोलेट एक्ट का भी विरोध किया जा रहा था जनरल डायर ने बिना चेतावनी दिए फीड पर गोली चला दी जिसमें 1650 गोलियां चलाई गई और वह उसे समय तक चलाई गई जब तक की सारी भीड़ समाप्त नहीं हो गई सरकारी रिपोर्ट के आधार पर वहां 400 व्यक्ति मारे गए और करीब 2000 व्यक्ति घायल हुए इसमें कोई संदेह नहीं है कि घायल और मरने वालों की संख्या निश्चित रूप से इससे अधिक थी जनरल टायर ने इस हत्याकांड के बाद अमृतसर लाहौर गुजरांवाला आदि में भी निवासियों पर अनेक अत्याचार किए पंजाब में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया इसके तहत 15 व्यक्तियों को मृत्युदंड और 40 को आजीवन कारावास दिया गया मार्शल लॉ शासन के समय ऐसे अत्याचार किया जो खून को जमाने वाले थे इसके अंतर्गत सर्वाधिक स्थान पर व्यक्तियों को फोड़ लगाए गए पेट के बल पर चलाया गया सरकार की इस नीति के विरोध रविंद्र नाथ टैगोर ने अपने सर की उपाधि वापस कर दी इस हत्याकांड में देश में असंतोष और गिरना फैला दी

 

कांग्रेस के अनुरोध पर पंजाब की घटनाओं की जांच करने के लिए सरकार ने 14 नवंबर 1919 को मिस्टर हंटर की अध्यक्षता में कमेटी नियुक्त किया गई हंटर कमेटी के समक्ष बयान देते हुए जनरल डायन ने स्वीकार किया कि उसने लोगों को तीतर भीतर करने के लिए 3 मिनट तक का समय दिया था और उसके बाद उसने गोली चलाई स्पष्ट है कि 3 मिनट में 25000 लोग तीतर भीतर नहीं हो सकते थे हंटर कमेटी के सदस्य न्यायाधीश टेकिंग में दया से पूछा कि क्या उसे क्षमा नहीं किया जा सका तो उसके जवाब में जनरल डायर ने कहा नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता था उसने उत्तर देते हुए यह भी कहा कि यह भैया बड़ा भयानक करते हुए था जो मुझे पूरा करना पड़ा मैंने सोचा मुझे गोलियां अच्छी तरह से और खूब चलनी चाहिए ताकि मुझे किसी और व्यक्ति पर गोली चलाने की दोबारा आवश्यकता नहीं पड़े मैं सोचता हूं कि यह संभव है की भीड़ को गोली चलाएं जाने के बाद सभी लोग स्थित डर हो सकते हैं परंतु दोबारा मेरे पास वह ना आए और मेरे ऊपर हंसते और मैं बेवकूफ नहीं बनना चाहता था

 

 

मार्च 1920 में हंटर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट दी इसमें सरकारी अधिकारियों के दृष्टिकोण को सही माना गया जनरल डायल को गलत निर्णय के अपराध में नौकरी से हटा दिया गया परंतु इंग्लैंड के समाचारों में डायरेक्ट को ब्रिटिश साम्राज्य का रक्षक घोषित किया जनता ने उसके गुजरे के लिए जनता इकट्ठा किया ब्रिटिश सरकार ने जनरल टायर की सेवाओं की प्रशंसा की और उसे स्वोर्ड आफ ऑनर मां अर्थात मन की तलवार की उपाधि दी गई 2000 पूर्ण का इनाम भी उसे दिया गया सारी कार्यवाही देखकर राष्ट्रवादियों में मृत्यु गति से असंतोष फैल गया कांग्रेस ने दोषी अधिकारियों को दंड देने तथा मृत्यु व्यक्तियों के परिवार को आर्थिक सहायता देने की मांग की परंतु सरकार ने इस और कोई ध्यान नहीं दिया

 

 

(3) खिलाफत आंदोलन (1919 ई.)

 

टर्की का सुल्तान मुसलमानों का खलीफा (धार्मिक नेता) समझा जाता था। प्रथम विश्वयुद्ध में इंगलैंड ने टर्की के विरुद्ध युद्ध में भाग लिया था। महायुद्ध काल में भारतीय मुसलमानों को ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉयड जार्ज ने 5 जनवरी, 1918 ई. को यह आश्वासन दिया था कि युद्ध की समाप्ति के पश्चात् वे टर्की का अहित नहीं करेंगे, उसके प्रति बदले की नीति नहीं अपनाएंगे, टर्की के टुकड़े नहीं करेंगे और खलीफा की प्रतिष्ठा को क्षति नहीं पहुँचाएंगे। अतः भारतीय मुसलमानों ने युद्ध के दौरान अंग्रेजों की हर प्रकार से सहायता की। युद्ध की समाप्ति के पश्चात् 10 अगस्त, 1919 ई. को सेत्र की संधि हुई, जिसके अनुसार तुर्की साम्राज्य को भंग कर दिया गया तथा वहाँ के सुल्तान को बंदी बनाकर कुस्तुंतुनियाँ भेज दिया गया। भारतीय मुसलमानों ने अंग्रेजों की टर्की के प्रति नीति से असंतुष्ट होकर एक आंदोलन प्रारंभ कर दिया, जिसे ‘खिलाफत आंदोलन’ कहते हैं। इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली ने सारे देश में इसे लोकप्रिय बनाने का काम जोर-शोर से शुरू कर दिया। गाँधीजी ने हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करने के लिए इस आंदोलन का समर्थन किया। 24 नवंबर, 1919 ई. को दिल्ली में अखिल भारतीय खिलाफत सम्मेलन हुआ, जिसमें गाँधीजी को अध्यक्ष चुना गया। गाँधीजी के निर्देशानुसार असहयोग एवं बहिष्कार की नीति के आधार पर आंदोलन चलाया गया। गाँधीजी ने इसे सफल बनाने के लिए सारे देश का दौरा किया। गाँधीजी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन क्रिया था, क्योंकि उनकी दृष्टि में टर्की केप्रति अंग्रेजों की नीति मुसलमानों के साथ विश्वासघात की थी। इसके अतिरिक्त असहयोग आंदोलन में मुसलमानों का सहयोग प्राप्त करने के लिए उनकी माँगों का समर्थन करना जरूरी था। इसलिए मुसलमानों ने भी गाँधीजी के असहयोग आंदोलन का समर्थन किया।

 

असहयोग आंदोलन (1920-1922 ई.)

 

रोलेट ऐक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड तथा खिलाफत आंदोलन आदि से क्षुब्ध होकर गाँधीजी ने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध 20 अगस्त, 1920 ई. को असहयोग आंदोलन प्रारंभ कर दिया।

 

आंदोलन के कार्यक्रम

 

सन् 1920 में कलकत्ता और नागपुर के कांग्रेस अधिवेशन में गाँधीजी की असहयोग आंदोलन की योजना को स्वीकार किया गया, जिसमें निम्न कार्यक्रमों का उल्लेख था-

 

  1. विदेशी वस्तुओं एवं शराब का बहिष्कार करना।.

 

  1. स्वदेशी वस्तुओं का. प्रयोग करना।’

 

  1. सरकारी उपाधियों तथा अवैतनिक पदों का त्याम।

 

  1. सरकारी तथा सरकारी मान्यता प्राप्त स्कूलों व कॉलेजों का बहिष्कार करना।

 

  1. सरकारी स्वागत समारोहों तथा उत्सवों का बहिष्कार करना।

 

  1. सरकार द्वारा आंयोजित चुनावों में किसी भी रूप में भाग न लेना।

 

  1. अंग्रेजी न्यायालयों का बृहिष्कार करना।

 

इन बहिष्कारों के द्वारा गाँधीजी सरकार के साथ पूर्ण असहयोग करके सरकारी तंत्र को विफल कर देनो चाहते थे। इस बहिष्कार के साथ कांग्रेस ने निम्नलिखित रचनात्मक कार्य करने पर जोर दिया-

 

  1. हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देना।

 

  1. छुआछूत को दूर करने का प्रयास करना।

 

  1. बच्चों की शिक्षा के लिए राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाएँ खोलना।

 

  1. विवादों को हल करने के लिए अपनी पंचायती अदालतों की स्थापना करना।

 

  1. स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग तथा खादी बुनने के लिए घर-घर सूत कातना।

 

आंदोलन की प्रगति

 

गाँधीजी का यह आंदोलन बड़ी तेजी से फैला। उन्होंने सरकार द्वारा दिए गए पदकों (ये मैडल उन्हें प्रथम महायुद्ध में सरकार की सहायता करने पर मिले थे) को वापस कर दिया था। सैंकड़ों राज्य कर्मचारियों ने नौकरियाँ छोड़ दीं। मजिस्ट्रेटों ने त्याग-पत्र दे दिए। वकीलों ने अदालतों को बहिष्कार किया। छात्रों ने स्कूलों और कॉलेजों को छोड़ दिया। इस हेतु कई राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाएँ खोली गई, जैसे-गुजरात विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ, बंगाल नेशनल विद्यापीठ, तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ, काशी विद्यापीठ, मुस्लिम यूनिवर्सिटी अलीगढ़ आदि। इस समय विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया और स्थान-स्थान पर विदेशी कपड़ों की होलियाँ जलाई गई। स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करने पर बल दिया गया, जिससे हजारों चर्खेचालू हो गए। आंदोलन सफलता के साथ चल रहा था। सरकार ने इसे शक्ति से कुचलने का. प्रयास किया। लगभंग 50 हज़ार से भी अधिक देशभक्त बंदी बनाए गए। सरकार ज्यों-ज्यों आंदोलन को दबाने के लिए कदम उठाती रहीं, त्यों-ज्यों यह आंदोलन उग्र रूप धारण करवा रहा। डॉ. अंसारी, शौकत अली, मुंहम्मद अली और अबुल कलाम आजाद आदि मुस्लिम नेताओं ने भी इस आंदोलन में जमकर भाग लिया। परिणामस्वरूप मुसलमान भी इस, आंदोलन में शामिल हो गए। इससे आंदोलन को बहुत अधिक बल मिला।

 

चोरी-चौरा कांड (1922 ई.)

 

तब 5 फरवरी नवंबर, 1921 ई. जब ब्रिटिश युवराज भारत आए, तो उनके विरोध में स्थान-स्थान पर प्रदर्शन हुए। जब आंदोलन तेजी पर था और सफलता के साथ चल रहा था तब 5 1922 ३) को उत्तर प्रदेश में गोरखपुर जिले के ‘चोरी-चौरा’ नामक स्थान पर पुलिस ने अहिंसात्मक आंदोलनकारियों पर गोली चला दीं। जब उनकी गोलियाँ समाप्त हो गईं. तब वे भागकर थाने में छिप गए। उत्तेजित आंदोलन‌कारियों ने एक पुलिस चौकी में आग लगा दी, जिसमें 1 थानेदार और 21 सिपाही जीवित जलकर मर गए। परंतु जब आंदोलन ने हिंसात्मक रूप धारण कर लिया, तो गाँधीजी के हृदय को भारी ठेस पहुँत्ती परिणामस्वरूप 11 फरव्ही, 1922 ई. को बारदौली में उन्होंने आंदोलन को समाप्त करने की घोषणा कर दी। डॉ. आर.सी. मजूमदार ने लिखा है कि “गाँधीजी का असहयोग आंदोलन को इस प्रकार स्थगित करना भारी भूल थी। इससे राष्ट्रीय आंदोलन की प्रगति को एक गहरी चोट लगी। यदि उनमें इस बात की अनुमान लगाने की भी दूरदर्शिता नहीं थी कि इतने बड़े देश में आंदोलन के समय हिंसात्मक घटना घट सकती है, तो वे निश्चय ही मानवीय चरित्र के अच्छे पारखी नृ थे। या तो उन्हें इस बात का विश्वास कर लेने के बाद कि तीस करोड़ भारतीय उनके तथा उनके सिद्धांतों के सच्चे अनुयायी हैं, आंदोलन शुरू करना चाहिए था या शुरू करने के बाद एक हिंसात्मक घटना के कारण चाहे वह कितनी ही बुरी क्यों न थी, आंदोलन को स्थगित नहीं करना चाहिए था। श्री सुभाषचंद्र बोस के शब्दो में “उस समय जबकि जनता का उत्साह चरम सीमा पर था, मैदान छोड़ने का आदेश देना, राष्ट्रीय दुर्भाग्य से कुछ कम न था।” अचानक आंदोलन के स्थगित करने से नेताओं ने गाँधीजी की आलोचना की और कुछ समय के लिए वे अलोकप्रिय हो गए। ब्रिटिश सरकार ने इस स्थिति का लाभ उठाकर हिंसात्मक कार्यवाहियों के लिए गाँधीजी को उत्तरदायी माना तथा उन पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें 6 वर्ष के कठोर कारावास का दंड दिया गया।

 

आंदोलन की असफलता के कारण

 

असहयोग आंदोलन गाँधीजी के नेतृत्व में दो वर्ष तक चला। यह आंदोलन अपने उ‌द्देश्यों की पूर्ति में असफल रहा। इसकी असफलता के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

 

  1. इस आंदोलन के द्वारा वर्ष 1920-21 में होने वाले विधानमंडलों के चुनाव का बहिष्कार किया गया था, परंतु उदारवादी नेताओं ने इस चुनाव में भाग लिया और वे चुनाव जीत गए। फलतः कांग्रेस के देशभक्त नेता विधानमंडलों में नहीं जा सके। इसलिए चुनाव के बहिष्कार से कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हुआ।8 आधुनिक भारत का वृहत् इतिहास

 

  1. जब आंदोलन चरमोत्कर्ष की स्थिति पर था, तब गाँधीजी ने इसे स्थगित करने का आदेश दिया। यदि आंदोलन कुछ दिन और चलता, तो ब्रिटिश सरकार को विवश होकर कुछ माँगें माननी पड़तीं। किंतु गाँधीजी द्वारा बिना अपने सहयोगियों के परामर्श से आंदोलन को स्थगित कर देने से कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ और उनके सहयोगियों (देश बंधु चितरंजनदास, मोतीलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस) ने भी उनकी इस नीति की कटु आलोचना की।

 

  1. ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति के सामने आंदोलन का अधिक समय तक चलना असंभव था।

 

आंदोलन का महत्त्व

 

असफल

 

यद्यपि आंदोलन सफल रहा फिर भी अनेक दृष्टिकोणों से यह महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ-

 

  1. यह पहला जन-आंदोलन था, जो राष्ट्रीय स्तर पर चलाया गया। पहली बार सारे राष्ट्र में नई चेतना एवं जाग्रति उत्पन्न हुई। इस आंदोलन में मजदूर, किसान तथा जन-साधारण ने सक्रिय रूप से भाग लिया।

 

  1. महात्मा गाँधी ने आंदोलनकारियों को सत्याग्रह के रूप में अहिंसा का अस्त्र प्रदान किया। जब सरकार ने शांत सत्याग्रहियों पर लाठी बरसाईं अथवा गोलियाँ चलाईं, तो जन-साधारण की सहानुभूति उनके साथ हो गई और ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध असंतोष बढ़ा।

 

  1. आंदोलन के दौरान विदेशी माल का बहिष्कार किया गया। एक ओर, इससे ब्रिटिश सरकार की आर्थिक शोषण की नीति में रुकावट पैदा हो गई, दूसरी ओर, स्वदेशी माल के प्रयोग पर बल दिया गया। परिणामस्वरूप हजारों बेरोजगार जुलाहों को काम मिला।

 

असहयोग आंदोलन की सफलताओं के विषय में सुभाषचंद्र बोस ने कहा था, “सन् 1921 के वर्ष ने देश को निःसंदेह एक सुव्यवस्थित पार्टी संगठन प्रदान किया। इससे पूर्व कांग्रेस एक वैधानिक दल और वह भी मुख्य रूप से बातचीत करने वाली संस्था थी। महात्माजी ने इसे नया विधान दिया और उसे देशव्यापी बनाया। उन्होंने इसे एक क्रांतिकारी संगठन में परिवर्तित कर दिया। देश के एक कोने से दूसरे कोने तक एक जैसे नारे लगाए जाने लगे, एक जैसी नीति और, एक जैसी विचारधारा हर जगह दिखाई देने लगी। अंग्रेजी भाषा का महत्त्व जाता रहा और कांग्रेस ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया। खादी सभी कांग्रेसियों की नियमित पोशाक बन गई।”।

 

स्वराज्य दल (1923 ई.)

 

असहयोग आंदोलन की शिथिलता के दौरान कांग्रेस के स्वराज्य दल का उदय हुआ। इस दल की स्थापना सन् 1923 में देश बंधु चितरंजनदास व मोतीलाल नेहरू ने की। वे भारत को स्वराज्य दिलाने के पक्ष में थे। गाँधीजी का समर्थन भी इस दल को प्राप्त था। सन् 1923 के

 

चुनावों में इस दल ने भाग लिया। इसके नेता मोतीलाल नेहरू ने विधानमंडलों में बाधा नीति अथवा दबाव की नीति अपनाई। इससे सरकार को स्पष्ट हो गया कि सन् 1919 के अधिनियम से जनता संतुष्ट नहीं है। इसलिए उसने समय से पूर्व साइमन कमीशन की नियुक्ति कर दी।

साइमन कमीशन (1927 ई.) 8 Mor 1997 सर मान सिंहमन

 

सन् 1919 के अधिनियम के अनुसार दस वर्ष बाद भारत में उत्तरदायी सरकार की प्रगति की जाँच के लिए एक आयोग नियुक्त करने की व्यवस्था थी। किंतु भारतीय परिस्थितियों से बाध्य होकर 8 नवंबर, 1927 ई. को ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में-एक कमीशन नियुक्त किया, जिसमें साइमन के अतिरिक्त छः सदस्य थे। इसके सभी सदस्य अंग्रेज होनें से भारतीयों ने इसका विरोध व बहिष्कार किया। 3 फरवरी, 1928 ई. को कमीशन बंबई पहुँचा, तो उसके विरुद्ध प्रदर्शन किए गए। जहाँ भी कमीशन गया, भारतीय जनता ने हड़तालों, जुलूसों और काली झंड़ियों और ‘साइमन वापिस, जाओ’ के नारों से इसका स्वागत करके असंतोष का प्रदर्शन किया। पुलिस ने इस विरोध को दबाने के लिए दमन नीति का सहारा लिया। परंतु इससे जनता का उत्साह मंद नहीं हुआ। जब कमीशन- लाहौर पहुँचा, तो लाला लाजपतराय के नेतृत्व में इसका बहिष्कार किया गया। पुलिस अधिकारी सांडर्स ने लालाजी पर लाठियों की वर्षा की। जिससे उनके सख्त चोटें आईं और कुछ दिनों बाद उनका स्वर्गवास हो गया। बाद में सरदार भगतसिंह तथा चंद्रशेखर आजाद आदि क्रांतिकारियों ने सांडर्स की हत्या कर राष्ट्रीय अपमान का बदला लिया। जब कमीशन लखनऊ पहुँचा, जवाहरलाल नेहरू कमीशन विरोधी जुलूस का नेतृत्व कर रहे थे, तो उन पर बुरी तरह से लाठियाँ बरसाई गई। इस प्रकार पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर भयंकर अत्याचार किए।

 

साइमन कमीशन ने मई, 1930 ई. में रिपोर्ट दी, जो जून, 1930 ई. को प्रकाशित हुई। साइमन कमीशन की रिपोर्ट से भी भारतीय जनता संतुष्ट नहीं थी। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

 

  1. भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य नहीं दिया गया।

 

  1. प्रांतों को स्वायत्तता दी गई किंतु गवर्नरों को विशेष अधिकार देकर उसे सीमित कर दिया गया।

 

  1. केंद्र में उत्तरदायी सरकार की स्थापना नहीं की गई।

 

प्रतिरक्षा को भारतीयों के हाथों में नहीं सौपा गया था। इसलिए भारतीयों ने इसकी निंदा की। राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत श्री शिव स्वामी अय्यर ने कहा कि, कमीशन की रिपोर्ट को रद्दी की टोकरी में डाल देना चाहिए। किंतु बाद में सन् 1935 के अधिनियम में इसकी अनेक बातें अपना ली गईं।

 

नेहरू रिपोर्ट

 

भारत के संविधान का मसविदा तैयार करने के लिए एक कमेटी नियुक्त की गई। इसके अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू थे। इस समिति में मिसदस्य थे। इस समिति ने जो रिपोर्ट तैयार की, उसे नेहरू रिपोर्ट कहते हैं। मुस्लिम लीग के नेता श्री मोहम्मद अली जिन्ना ने इस रिपोर्ट के मुकाबले में अपनी चौदह शर्तें पेश कीं, ताकि इस रिपोर्ट का स्वरूप ही बदल जाए। कांग्रेस के कलकत्ताअधिवेशन में यह निश्चय किया गया कि यदि सरकार 31 दिसंबर, 1929 ई. तक रिपोर्ट को स्वीकार नहीं करे, तो सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ किया जाए और पूर्ण स्वतंत्रता ही राष्ट्रीय लक्ष्य हो जाएगा।

 

लाहौर अधिवेशन (31 दिसंबर, 1929 ई.) एवं पूर्ण स्वाधनीता का प्रस्ताव

 

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में सबसे महत्त्वपूर्ण घटना कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन है। 31 दिसंबर, 1929 ई. में लाहौर में रावी नदी के तट पर कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। इसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की। इस अधिवेशन में मध्य रात्रि को पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पारित कर दिया गया था। कांग्रेस के आदेश से 26 जनवरी, 1930 ई. का दिन सारे देश में ‘स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाया गया।

 

सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930 ई.)

 

साइमन कमीशन की असफलता, ब्रिटिश सरकार द्वारा नेहरू रिपोर्ट को स्वीकार नहीं करना, कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन और पूर्ण स्वाधीनता के प्रस्ताव से घटनाक्रम और भी तीव्र होता गया। महात्मा गाँधी ने वायसराय को पत्र लिखकर ग्यारह माँगें प्रस्तुत कीं, जिन्हें अस्वीकार करने पर गाँधीजी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का निश्चय किया गया। गाँधीजी ने अहिंसात्मक ढंग से आंदोलन करते हुए सरकार के प्रति असहयोग का रवैया अपनाया था, उसे ही संविनय अवज्ञा आंदोलन के नाम से पुकारते हैं।,

 

आंदोलन के कार्यक्रम

 

इस आंदोलन के प्रमुख कार्यक्रम निम्नलिखित थे-

 

  1. जगह-जगह पर नमक कानून तोड़कर नमक बनाया जाए।

 

  1. सरकारी नौकरियों अदालतों और शिक्षण संस्थाओं, उपाधियों का बहिष्कार किया जाए।

 

  1. स्त्रियाँ शराब, अफीम और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरना दें।

 

  1. विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जाए और उन्हें जलाया जाए।

 

  1. जनता सरकार को टैक्स न चुकाए।

 

दांडी कूच

 

इस कार्यक्रम के अंतर्गत गाँधीजी 12 मार्च, 1930 ई. को अपने 79 साथियों सहित साबरमती आश्रम से पैदल दांडी के लिए रवाना हुए। ‘200 मील की लंबी यात्रा 24 दिन में पूरी की गई। 6 अप्रैल, 1930 ई. को गाँधीजी ने दांडी के समुद्रतट पर नमक कानून को तोड़कर नमक बनाया।

 

आंदोलन की प्रगति

 

गाँधीजी ने नमक कानून को तोड़कर इस आंदोलन का सूत्रपात किया। यहाँ से सारे देश में अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ हो गया, जिसका प्रभाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया। गाँधीजी का

 

अनुसरण करते हुए हजारों लोगों ने नमक कानून का उल्लंघन करते हुए स्थान-स्थान पर नमक बनाया। विदेशी वस्त्रों की होलियाँ चलाई गईं। स्त्रियों ने पर्दा प्रथा को त्यागकर ‘सत्याग्रह में भाग लिया। उन्होंने शराब की दुकानों पर धरने दिए, जिससे बहुत-सी दुकानें बंद हो गईं। किसानों ने टैक्स चुकाने से इंकार कर दिया। इस प्रकार, असहयोग से अंग्रेज सरकार को भारी धक्का लगा। सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए क्रूरता से काम लिया। जगह-जगह पर लाठी चार्ज हुआ और गोलियाँ चलीं। गाँधीजी सहित 90 हजार व्यक्तियों को बंदी बनाकर जेल में ठूंस दिया गया।

 

ग्राँधी इरविन समझौता (1931 ई.)

 

जब भारत में आंदोलन चल रहा था, तब अंग्रेज सरकार ने लंदन में 12 सितंबर, 1930 ई. को गोलमेज परिषद् का आयोजन किया। इसमें कांग्रेस ने भाग नहीं लिया, जिसके कारण वह अपने उद्देश्य से सफल नहीं हो सका। सरकार ने देशभर में अच्छा वातावरण बनाने के लिए 26 जनवरी, 1931 ई. को गाँधीजी को जेल से रिहा कर दिया। तेज बहादुर सप्रू और श्री जयकर के प्रयत्नों से गाँधीजी व इरविन के बीच 15 मार्च, 1931 ई. को एक समझौता हुआ, जो गाँधी इरविन समझौता के नाम से प्रसिद्ध है।

 

समझौते की मुख्य शर्ते

 

इस समझौते की मुख्य शर्तें निम्नलिखित थीं-

 

  1. सरकार अपने सभी अध्यादेशों और चालू मुकदमों को वापिस ले लेगी।.

 

  1. हिंसात्मक अपराधियों के अतिरिक्त सभी आंदोलनकारियों को जेल से रिहा कर दिया जाएगा।

 

  1. सत्याग्रहियों की जब्त की हुई सम्पत्ति उन्हें वापस लौटा दी जाएगी।

 

  1. मदिरा, अफीम और विदेशी वस्तुओं की दुकानों पर शांतिपूर्ण तरीके से धरना दे सकेंगे।

 

समुद्र के पास रहने वाले लोगों को सरकार द्वारा बिना टैक्स के नमक बनाने का अधिकार दिया जाएगा।

 

कांग्रेस की ओर से गाँधीजी ने आश्वासन दिया कि-

 

कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित कर देगी।

 

  1. कांग्रेस द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेगी।

 

३. पुलिस द्वारा किए गए अत्याचारों के बारे में निष्पक्ष जाँच की माँग छोड़ दी जाएगी।

 

गाँधी इरविन समझौते की समीक्षा

 

गाँधी इरविन समझौते पर मिश्रित प्रतिक्रिया हुई। गाँधीजी की दृष्टि में. यह समझौता बहुत महत्त्वपूर्ण था। उनके अनुसार पहली बार अंग्रेज सरकार ने भारतीय नेताओं के साथ समानता के स्तर पर बात की थी, परंतु सुभाषचंद्र बोस तथा जवाहरलाल नेहरू जैसे कांग्रेसी नेता इस समझौते से प्रसन्न नहीं थे। इस समय कांग्रेस का उद्देश्य पूर्ण स्वतंत्रता था, जबकि गाँधीजी ने बिना इस बात का ध्यान दिए समझौता कर लिया था। कांग्रेस के युवा नेता इसलिए भी असंतुष्ट थे, क्योंकि समझौता करने से पहले तीन क्रांतिकारियों-भगतसिंह, राजगुरु और

 

सुखदेव की फाँसी की सजा को भी गाँधीजी आजीवन कारावास में नहीं बदलवा सके। 25 मार्च, 1931 ई को कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन कराची में बुलाया गया, उस समय तीनों क्रांतिकारियों (भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु) को फाँसी हो चुकी थी। इसलिए नवयुवकों ने गाँधीजी का विरोध किया। गाँधीजी बड़ी कठिनाई से इस समझौते को कांग्रेस से स्वीकृत करा सके।

 

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931 ई.)

 

ब्रिटिश सरकार ने नवंबर, 1931 ई. को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें कांग्रेस की ओर से गाँधीजी ने भाग लिया। ब्रिटिश सरकार के विरोधी रुख के कारण, जिन्ना की चौदह शर्त मनवाने की जिद्द एवं अंबडेकर द्वारा हरिजनों के लिए पृथक् प्रतिनिधित्व की जिद के कोरण सम्मेलन में कोई निर्णय नहीं हो सका। गाँधीजी वापिस भारत आ गए।

 

सविनय अवज्ञा आंदोलन की पुनरावृत्ति

 

गाँधीजी की अनुपस्थिति में दमनचक्र फिर से प्रारभ हो गया था। इसलिए गाँधीजी ने भारत आते ही सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ कर दिया। सरकार ने दमनचक्र तेज कर दिया। कांग्रेस को गैर कानूनी संस्था घोषित कर दिया गया। गाँधीजी और पटेल के साथ एक लाख बीस हजार व्यक्तियों को जेल में ठूंस दिया गया। देश की परिवर्तित परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए 7 अप्रैल 1934 ई. को गाँधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को समाप्त कर दिया।

 

गाँधीजी ने जब बिना किसी कारण बताए आंदोलन को स्थगित कर दिया, तब सुभाषचंद्र बोस तथा वल्लभभाई पटेल आदि कांग्रेसी नेताओं ने उनके इस निर्णय की कटु आलोचना की। उन्होंने कहा, “गाँधीजी ने पिछले 13 वर्ष की मेहनत तथा कुर्बानियों पर पानी फेर दिया है” गाँधीजी द्वारा आंदोलन को स्थगित करना अपनी असफलताओं को स्वीकार करना था। डॉ. आर.सी. मजूमदार के शब्दों में, “गाँधीजी द्वारा इस प्रकार / आंदोलन को स्थगित करना एक भारी भूल ही न थी, अपितु एक दुखदपूर्ण घटना भी थी। उन्हें लोगों के जीवन तथा धन-सम्पत्ति से अनुचित ढंग से खिलवाड़ करने का कोई अधिकार न था। सत्याग्रह स्थगित करने के पश्चात् महात्माजी ने वायसराय से जब मुलाकात के लिए समय माँगा, तो उसने उनकी प्रार्थना को ठुकरा दिया। वायसराय का यह रवैया जहाँ राष्ट्रीय अपमान था, वहाँ आंदोलन को जारी रखने की चुनौती भी थी। गाँधीजी इस चुनौती का उत्तर देने में असमर्थ रहे। उनका सत्याग्रह का राजनीतिक शस्त्र निष्फल प्रमाणित हुआ। सन् 1932 में लंदन में तीसरा गोलमेज सम्मेलन हुआ। परंतु इसमें कांग्रेस ने भाग नहीं लिया, क्योंकि देश में सविनय अवज्ञा आआंदोलन पुनः प्रारंभ हो गया था।

 

सांप्रदायिक पंचाट

 

भारत की सांप्रदायिक समस्या को हल करने के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री मेकडोनालड  ने 18 अगस्त, 1932 ई. को ‘सांप्रदायिक पंचाट’ की घोषणा की, जो मेकडानल्ड पंचाट के नाम से भी प्रसिद्ध है। इसके अनुसार ईसाइयों और मुसलमानों के समान हरिजनों को भी हिंदुओं से अलग अल्पसंख्यक माना गया और उनके लिए पृथक् प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गई। अंग्रेज सरकार राष्ट्रीय आंदोलन कौ कमजोर बनाना चाहती थी। इसलिए उसने हरिजनों को हिंदुओं से अलग करने का प्रयास किया। इस समझौते में हिंदुओं के साथ भी न्याय नहीं किया गया। जिन प्रांतों में मुसलमान अल्पमत में थे, वहाँ के मुसलमानों को कुछ रियायतें दी गई। परंतु हिंदुओं को अल्पमत वाले प्रांतों में वैसी ही. रियायतें नहीं दी गईं। पंजाब में सिक्खों तथा बंगाल में यूरोपियनों को जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की गई। भारतीय ईसाइयों ने कभी अलग प्रतिनिधित्व की माँग नहीं की थी। फिर भी, यह पद्धति उन पर लाद दी गई।

 

पूना समझौता 26 सितंबर, 1932 ई.

 

गाँधीजी ने इस सांप्रदायिक पंचाट के विरुद्ध 20 सितंबर, 1932 ई. को जेल में आमरण अनशने प्रारंभ कर दिया। अंत में, मालवीयजी तथा डॉ. राजेंद्रप्रसाद के प्रयत्नों से हरिजन नेता डॉ. अंबेडकर तथा कांग्रेस में एक समझौता हुआ, जिसे पूना समझौता के नाम से पुकारा जाता है। इसके अनुसार, हरिजनों ने पृथक् चुनाव की माँग को त्याग दिया तथा व्यवस्थापिका सभाओं में अछूतों के स्थान भी हिंदुओं के अंतर्गत ही सुरक्षित रखे गए।

 

सन् 1935 को अधिनियम व 1937 के निर्वाचन अंग्रेज सरकार ने भारतीयों को संतुष्ट करने के लिए सन् 1935 में एक अधिनियम पारित किया, जिसके द्वारा प्रांतीय शासन प्रबंध का संचालन भारतीयों के हाथों में सौंप दिया गया। सरकार के इस आश्वासन पर, कि गवर्नर दिन-प्रतिदिन के शासन में भारतीय मंत्रियों के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, कांग्रेस ने सन् 1937 के चुनावों में भाग लिया और 8, प्रांतों में. अपने मंत्रिमंडल बनाए। इन कांग्रेसी मंत्रिमंडलों ने गाँधीजी के रचनात्मक कार्यों को क्रियांवित करने का हरसंभव प्रयास किया।

 

द्वितीय विश्वयुद्ध एवं संवैधानिक गतिरोध

 

सन् 1939 में द्वितीय युद्ध प्रारंभ हो गया, तो ब्रिटिश सरकार ने बिना कांग्रेसी मंत्रिमंडलों के परामर्श के भारत को इंगलैंड के समर्थन में युद्ध में शामिल कर दिया। परिणामस्वरूप अंग्रेज सरकार की इस नीति का विरोध करते हुए कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने त्याग-पत्र दे दिए। इस पर जिन्ना ने कहा, “भारतीय मुसलमानों को हिंदुओं के अत्याचार, अन्यायपूर्ण और क्रूर शासन से मुक्ति प्राप्त हुई है।” जिन्ना ने भारतीय मुसलमानों को 22 दिसंबर, 1939 ई. को ‘मुक्ति दिवस’ के रूप में मनाने की अपील की। सन् 1940 में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान का प्रस्ताव पारित कर दिया और इस माँग को मनवाना ही उसका मुख्य उद्देश्य हो गया।

 

क्रिप्स प्रस्ताव (1942 ई.)

 

अंग्रेजों द्वारा कांग्रेस की माँग को पूरा न करने के कारण ब्रिटिश सरकार को युद्ध में सहायता न देने के लिए गाँधीजी ने सन 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह चलाया था। हजारों व्यक्ति फिर जेल गए। किंतु जापान की बढ़ती प्रगति को देखकर, (जापान ने 8 मार्च, 1942 ई. को रंगूनपर अधिकार कर लिया था तथा भारत को अंग्रेज़ी नियंत्रण से मुक्त करवाने के लिए भारत पर आक्रमण करने की घोषणा की थी) महात्मा गाँधी ने 30 दिसंबर, 1941 ई. को इस आंदोलन को स्थगित कर दिया। ऐसी स्थिति में सरकार ने समझौते का प्रयत्न किया और इस कार्य के लिए सर स्टेफर्ड क्रिप्स को सन 1942 में भारत भेजा गया। उसने सभी राजनीतिक दों के प्रतिनिधियों से बातचीत करने के बाद अपने प्रस्तावों की 30 मार्च, 1942 ई. को घोषणा कर दी। इसे क्रिप्स प्रस्ताव कहते हैं।

 

यद्यपि इस प्रस्ताव में भारत को औपनिवेशिक साम्राज्य देने की सिफारिश की गई थी। परंतु कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। कांग्रेस का कहना था कि इसमें पाकिस्तान की माँग को स्वीकार कर लिया गया है, जबकि मुस्लिम लीग इसलिए नाराज थी कि इसमें पाकिस्तान की माँग को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया गया है और उसके लिए एक अलग संविधान की व्यवस्था नहीं है। परिणामस्वरूप क्रिप्स मिशन पूर्णतया असफल रहा। कुछ विद्वानों के अनुसार, क्रिप्स योजना लिनलिथगो की अगस्त, 1940 ई. की योजना से अधिक प्रगतिशील थी। परंतु गाँधीजी ने इसके संबंध में कहा था “यह एक आगे की तारीख का चैक था, जिसका बैंक नष्ट होने वाला था।” (It was Post dated Cheque on a Crashing bank)

 

भारत छोड़ो आंदोलन (8 अगस्त, 1942 ई.)

 

क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद भारतीयों के समक्ष स्वतंत्रता आंदोलन को आरंभ करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं था। इसलिए कांग्रेस को विवश होकर भारत छोड़ो आंदोलन चलाना पड़ा।

 

आंदोलन के कारण

 

इस आंदोलन के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

 

  1. क्रिप्स मिशन की असफलता के पश्चात् भारतीयों के समक्ष आंदोलन के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं था।

 

  1. कांग्रेस पूर्ण स्वतंत्रता चाहती थी, जिसे ब्रिटिश सरकार नहीं देना चाहती थी। अतः जनता में स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु लालसा अब और अधिक तीव्र हो उठी।

 

  1. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान ने अंग्रेजों को पराजित कर सिंगापुर, मलाया और बर्मा पर अधिकार कर लिया था। इससे महात्मा गाँधीजी को यह समझते देर न लगी. कि ब्रिटेन भारत की रक्षा करने में असमर्थ है। गाँधीजी की यह मान्यता थी कि यदि भारत पर अंग्रेजों का अधिकार रहेगा, तो जापान निश्चित रूप से भारत पर आक्रमण करेगा। यदि अंग्रेज भारत छोड़कर चले जाएँ, तो शायद भारत पर जापान आक्रमण न करे। इसलिए गाँधीजी ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए कहा।

 

इन परिस्थितियों में 8 अगस्त, 1942 ई. में बंबई में कांग्रेस महासमिति ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के ऐतिहासिक प्रस्ताव को पारित कर दिया। इस प्रकार, इस प्रस्ताव के अनुसार अग्रेज सरकार को चेतावनी दी गई थी कि यदि अंग्रेज तुरंत भारत छोड़कर नहीं गए, तो सारे देश में गाँधीजी के नेतृत्व में अत्यधिक व्यापक पैमाने पर अहिंसात्मक तरीके से आंदोलन प्रारंभ

पर अधिकार कर लिया था तथा भारत को अंग्रेज़ी नियंत्रण से मुक्त करवाने के लिए भारत पर आक्रमण करने की घोषणा की थी) महात्मा गाँधी ने 30 दिसंबर, 1941 ई. को इस आंदोलन को स्थगित कर दिया। ऐसी स्थिति में सरकार ने समझौते का प्रयत्न किया और इस कार्य के लिए सर स्टेफर्ड क्रिप्स को सन 1942 में भारत भेजा गया। उसने सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से बातचीत करने के बाद अपने प्रस्तावों की 30 मार्च, 1942 ई. को घोषणा कर दी। इसे क्रिप्स प्रस्ताव कहते हैं।

 

यद्यपि इस प्रस्ताव में भारत को औपनिवेशिक साम्राज्य देने की सिफारिश की गई थी। परंतु कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। कांग्रेस का कहना था कि इसमें पाकिस्तान की माँग को स्वीकार कर लिया गया है, जबकि मुस्लिम लीग इसलिए नाराज थी कि इसमें पाकिस्तान की माँग को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया गया है और उसके लिए एक अलग संविधान की व्यवस्था नहीं है। परिणामस्वरूप क्रिप्स मिशन पूर्णतया असफल रहा। कुछ विद्वानों के अनुसार, क्रिप्स योजना लिनलिथगो की अगस्त, 1940 ई. की योजना से अधिक प्रगतिशील थी। परंतु गाँधीजी ने इसके संबंध में कहा था “यह एक आगे की तारीख का चैक था, जिसका बैंक नष्ट होने वाला था।” (It was Post dated Cheque on a Crashing bank)

 

भारत छोड़ो आंदोलन (8 अगस्त, 1942 ई.)

 

क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद भारतीयों के समक्ष स्वतंत्रता आंदोलन को, आरंभ करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं था। इसलिए कांग्रेस को विवश होकर भारत छोड़ो आंदोलन चलाना पड़ा।

 

आंदोलन के कारण

 

इस आंदोलन के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

 

  1. क्रिप्स मिशन की असफलता के पश्चात् भारतीयों के समक्ष आंदोलन के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं था।

 

  1. कांग्रेस पूर्ण स्वतंत्रता चाहती थी, जिसे ब्रिटिश सरकार नहीं देना चाहती थी। अतः जनता में स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु लालसा अब और अधिक तीव्र हो उठी।

 

  1. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान ने अंग्रेजों को पराजित कर सिंगापुर, मलाया और बर्मा पर अधिकार कर लिया था। इससे महात्मा गाँधीजी को यह समझते देर न लगी कि ब्रिटेन भारत की रक्षा करने में असमर्थ है। गाँधीजी की यह मान्यता थी कि यदि भारत पर अंग्रेजों का अधिकार रहेगा, तो जापान निश्चित रूप से भारत पर आक्रमण करेगा। यदि अंग्रेज भारत छोड़कर चले जाएँ, तो शायद भारत पर जापान आक्रमण न करे। इसलिए गाँधीजी ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए कहा।

 

इन परिस्थितियों में 8 अगस्त, 1942 ई. में बंबई में कांग्रेस महासमिति ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के ऐतिहासिक प्रस्ताव को पारित कर दिया। इस प्रकार, इस प्रस्ताव के अनुसार अग्रेज सरकार को चेतावनी दी गई थी कि यदि अंग्रेज तुरंत भारत छोड़कर नहीं गए, तो सारे देश में गाँधीजी के नेतृत्व में अत्यधिक व्यापक पैमाने पर अहिंसात्मक तरीके से आंदोलन प्रारंभ

 

कर दिया जाएगा। गाँधीजी ने इस समय देश को ‘करो या मरो’ गया था। (Do or Die) का नारा दिया

 

सरकार द्वारा आंदोलन का दमन

 

सरकार ने गाँधीजी सहित अनेक कांग्रेसी नेताओं को 9 अगस्त, 1942 ई. को गिरफ्तार कर किसी अज्ञात स्थान पर भेज दिया। कांग्रेस को अवैधानिक संगठन घोषित कर दिया गया। गाँधीजी की अनुपस्थिति में भी आंदोलन चलता रहा। स्थान-स्थान पर हड़तालें, प्रदर्शन और जुलूस निकाले गए। सरकार ने हजारों व्यक्तियों को जेल में ठूंस दिया। इस आंदोलन को कुचलने के लिए गोलियाँ चलाई गई व लाठी चार्ज भी हुआ। इसमें कई लोग मारे गए तथा अनेक जख्मी हुए। अतः लोगों ने सरकारी भवनों, इमारतों, रेलवे स्टेशनों, डाकखानों और पुलिस थानों पर आक्रमण कर उनमें आग लगा दी गई। अनेक स्थानों पर रेल की पटरियाँ उखाड़ दी गईं, तार की लाइनें काट दी गईं। सरकारी दमनपूर्ण नीति का जवाब आंदोलनकारियों ने बम फेंककर दिया। हिंसात्मक घटना घटित होने पर गाँधीजी ने जेल में उपवास किया। सरकार ने सन् 1944 तक आंदोलन को कुचल दिया।

 

अन्य दलों की आंदोलन के प्रति नीति

 

भारत के सभी राजनीतिक दलों की सहानुभूति इस आंदोलन के प्रति नहीं थी। साम्यवादी दल रूस की नीति से प्रभावित था। इसलिए उसने इस आंदोलन की आलोचना की तथा भारतीयों से ब्रिटिश सरकार की सहायता करने की अपील की। कांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारी से मुस्लिम लीग बहुत प्रसन्न थी। उसने इस आंदोलन की आलोचना करते हुए ब्रिटिश सरकार को सहायता देने की नीति को जारी रखा। हिंदू महासभा के प्रधान नेता वीर सावरकर ने भी इस आंदोलन की तीव्र आलोचना की तथा इसमें हिंदुओं को भाग न लेने की अपील की। उदारवादी दल, हरिजन नेता अंबेडकर तथा अकाली दल आदि ने इस आंदोलन का विरोध किया।

 

आंदोलन का महत्त्व

 

सन् 1942 का आंदोलन सन् 1857 के बाद व्यापक पैमाने पर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध दूसरी देशव्यापी बगावत थी। आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस और सेना ने 538 बार गोलियाँ चलाई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इसमें 7 हजार व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त हुए। गैर सरकारी आँकड़ों के अनुसार 10,000 से लेकर 40,000 तक लोग मारे गए। 60,229 व्यक्तियों की जेलों में ठूंस दिया गया। डॉ. अंबा प्रसाद के अनुसार, “यद्यपि यह आंदोलन भारत को स्वतंत्रता नहीं दिला सका, तथापि इसने जनता में सरकार से मुकाबला करने की भावना उत्पन्न की। इसने भारतीय स्वतंत्रता के लिए पृष्ठभूमि तैयार की।”

 

इस आंदोलन से अंग्रेज समझ गए कि अब उनका अधिक समय तक भारत में राज्य करना संभव नहीं है। मुस्लिम लीग और कांग्रेस दोनों एक-दूसरे के विरोधी थे। दूसरे विश्वयुद्ध में जिन्ना ने अंग्रेज सरकार को हरसंभव सहायता दी और मुसलमानों को आंदोलन से अलग रहने की अपील की। परिणामस्वरूप अंग्रेज और मुस्लिम दोनों एक-दूसरे के समीप आने लगे। जब

 

जापान भारत पर आक्रमण की तैयारी में था, तब जिन्ना की सहायता को अंग्रेज सरकार बहुत महत्त्वपूर्ण मानती थी।

 

आंदोलन की असफलता के कारण

 

डॉ. अंबा प्रसाद के अनुसार इस आंदोलन की असफलता के तीन कारण थे-

 

  1. इस आंदोलन के संगठन और योजना में कई दोष विद्यमान थे। नेताओं में दूरदर्शिता का अभाव था। आंदोलन की घोषणा करने के पूर्व ही उनको अज्ञात स्थान पर चले जाना चाहिए था, परंतु जब सरकार ने उन्हें बंदी बना लिया, तो आंदोलन नेतृत्वविहीन हो गया। आंदोलन करने के उद्देश्यों में भी एकता नहीं थीं। एक ग्रुप अहिंसात्मक ढंग से आंदोलन चलाने के पक्ष में था, जबकि दूसरा हिंसात्मक ढंग से।

 

  1. इस आंदोलन काल में सरकारी कर्मचारियों, सेना, पुलिस और देशी राजाओं ने सरकार को हर ढंग से सहयोग प्रदान किया, जिससे सरकार के कार्य में कोई बाधा उपस्थित नहीं हुई। ये वफादार सेवक आंदोलनकारियों की गुप्त सूचनाएँ सरकार के पास पहुँचाते थे। इसलिए सरकार ने क्रूरता से आंदोलनकारियों को कुचल दिया।

 

  1. सरकार के मुकाबले में आंदोलनकारियों के पास साधन तथा शक्ति नहीं थी। सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए ऐसा दमन चक्र चलाया, जिसका सामना करना जन-साधारण के लिए कठिन हो गया।

 

यद्यपि इस आंदोलन से भारत को स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हुई, तथापि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इस आंदोलन में दिए गए बलिदान से भारतीय स्वतंत्रता निकट आ गई। सरदार पटेल ने कहा था, “भारत में ब्रिटिश राज्य के इतिहास में ऐसा विप्लव कभी नहीं हुआ, जैसा पिछले तीन वर्षों में हुआ। लोगों ने जो प्रतिक्रिया की, हमें उस पर गर्व है।”

 

राजगोपालाचारी योजना और जिन्ना गाँधी वार्ता (1944 ई.)

 

इस समय तक सांप्रदायिकता दंगे बहुत बढ़ चुके थे। जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान बनाने की माँग कर रहा थी। सन् 1944 में जब गाँधीजी जेल से छुटकर आए, तब सांप्रदायिक समस्या को हल करने के लिए राजगोपालाचारी ने एक फार्मूला या योजना प्रकाशित की, जो उन्हीं के नाम पर ‘सी. आर. फार्मूला’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें आत्मनिर्णय के अधिकार के आधार पर मुसलमानों की पाकिस्तान की माँग स्वीकार कर ली गई थी। इस फार्मूले की माँग इस फार्मूले के आधार पर गाँधीजी ने सन् 1944 में जिन्ना से बातचीत की, परंतु उसका कोई परिणाम नहीं निकला। जिन्ना बिना जनमत के पाकिस्तान बनाने की माँग पर डटे रहे, अतः वार्ता असफल हो गई।

 

गाँधीजी द्वारा जिन्ना से इस विषय पर बात करने से जिन्ना के गौरव में वृद्धि हुई। देश का विभाजन अब चर्चा का विषय बन चुका था। गाँधीजी ने इस विषय को सुलझाने के लिए जब बार-बार जिन्ना से निवेदन किया, तो उसका महत्त्व बढ़ गया। गाँधीजी ने पहली बार जिन्ना को, “कायदे आजम (महान् नेता) के नाम से संबोधित करके भारतीय मुसलमानों की दृष्टि में उसकी स्थिति को दृढ़ किया।” मौलाना आजाद के अनुसार, इस समय, गाँधीजी का

जिन्ना से मिलना भयंकर राजनीतिक भूल थी, क्योंकि गाँधीजी की जिन्ना के पीछे दौड़ने और बार-बार विनय निवेदन के कारण जिन्ना को भारतीय राजनीति में एक नया सम्मान और महत्त्व प्राप्त हुआ।”

 

शिमला सम्मेलन (1945 ई.)

 

लॉर्ड वेवल सन् 1944 में भारत का गवर्नर जनरल बनकर आया। उसने देश में अच्छा वातावरण बनाने के लिए गाँधीजी सहित अनेक कांग्रेसी नेताओं को जेल से रिहा कर दिया। इसके पश्चात् सभी राजनीतिक दलों का एक सम्मेलन शिमला में बुलाया। कांग्रेस की तरफ से मौलाना अबुल कलाम आजाद ने इसमें भाग लिया था। वेवल के द्वारा जिन्ना को अधिक महत्त्व देने के कारण तथा जिन्ना की हठधर्मीता के कारण यह सम्मेलन असफल रहा।

 

आजाद हिंद फौज पर मुकदमे तथा नौ सैन्य विद्रोह,

 

जापान में आजाद हिंद फौज का गठन सन् 1942 में भारतीय क्रांतिकारी रासबिहारी बोस ने किया था। जापान द्वारा बंदी बनाए गए 60,000 भारतीय सैनिक इस सेना में भर्ती हो गए।

 

जापान ने इस फौज को सैनिक सहायता प्रदान की। रासबिहारी ने जून, 1942 ई. में सुभाषचंद्र बोस को पूर्वी एशिया में आने का निमंत्रण दिया। सुभाष 21 अक्टूबर, 1943 ई. को सिंगापुर पहुँचे और आजाद हिंद फौज की कमान अपने हाथ में ले ली। इस सेना का उद्देश्य जर्मनी तथा जापान की सहायता से अंग्रेजों को पराजित करके भारत को स्वतंत्र कराना था। उन्होंने सैनिकों को आह्वान करते हुए कहा, “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।”

 

सुभाष के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज ने जापानी सेना की सहायता से भारत की पूर्वी सीमा और बर्मा में युद्ध लड़े और भारत को स्वतंत्र कराने का प्रयास किया, परंतु उन्हें अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त नहीं हुई। वे स्वयं एक हवाई जहाज की दुर्घटना में वीरगति को प्राप्त हुए। ब्रिटिश सरकार ने इस सेना के उन सैनिकों तथा पदाधिकारियों पर, जिन्हें पराजित कर बंदी बना लिया था, दिल्ली के लाल किले में नवंबर, 1945 ई. में मुकदमे चलाए। इनमें आजाद हिंद फौज के तीन अधिकारियों कर्नल सहगल, कर्नल ढिल्लन और मेजर शाहनबाज खाँ के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। जिन पर सरकार ने राजद्रोह का अरोप लगाया, क्योंकि ये युद्ध के दौरान भारतीय सेना को छोड़कर आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए थे। भारतीय जनता में इस बात से उत्तेजना फैल गई थी। पंडित नेहरू, सर तेज बहादुर सप्रू तथा भोलाभाई देसाई जैसे महारथियों ने इनकी रक्षा के लिए उच्चकोटि की दलीलें दीं। इतना होने पर भी ब्रिटिश सरकार ने उन तीनों को मृत्युदंड दिया। संपूर्ण भारतवर्ष की जनता ने इस निर्णय का विरोध किया और देश में चारों ओर यह आवाज उठने लगीं “लाल किले को तोड़ दो, आजाद हिंद फौज को छोड़ दो।” भारतीय जनमत के दबाव के समक्ष विवश होकर गवर्नर जनरल ने अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग करके इन तीनों का मृत्युदंड माफ कर दिया।

 

इन मुकदमों ने भारतवर्ष में तेजी से राष्ट्रीय चेतना जागृत कर दी। सारे देश में आजाद हिंद फौज के कार्यों की प्रशंसा की गई। इससे प्रभावित होकर वर्ष 1945-46 में बबई में भारतीय जल सेना ने विद्रोह कर दिया तथा कई अंग्रेज सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस

 

घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब अंग्रेजों के लिए भारत को और अधिक समय तक अपने अधिकार में रखना कठिन है।

 

केबीनेट मिशन

 

सन् 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के पश्चात् इंगलैंड में चुनाव हुए और एटली के नेतृत्व में लेबर पार्टी की सरकार बनी। इस पार्टी की भारत के साथ सहानुभूति थी। इसलिए ब्रिटिश सरकार ने भारतीय समस्या के समाधान के लिए तीन सदस्यों-सर स्टेफर्ड क्रिप्स, लॉर्ड पैथिक लारेंस एवं ए.वी. अलेक्जेंडर का एक मिशन भारत भेजा, जो केबिनेट मिशन के नाम से प्रसिद्ध है। इस कमीशन ने 16 मई, 1946 ई. को अपनी योजना की घोषणा कर दी थी।

 

भारत के संवैधानिक गतिरोध को दूर करने का यह एक ईमानदार प्रयास था। इसमें पाकिस्तान की माँग को स्वीकार नहीं किया गया था, परंतु केंद्र को दुर्बल बनाकर मुस्लिम लीग को संतुष्ट करने का प्रयास किया गया था। संविधान सभा का निर्माण एवं अंतरिम सरकार की व्यवस्था के माध्यम से भारतीयों को संतुष्ट करने का प्रयास किया गया था। परंतु प्रांतों को समूह में बाँटकर तथा उनको अलग-अलग संविधान बनाने का अधिकार देकर राष्ट्रीय एकता को महत्त्वहीन बना दिया गया था। कांग्रेस ने अंतरिम सरकार में भाग लेने का निश्चय किया, किंतु जिन्ना ने पाकिस्तान की माँग को लेकर सीधी कार्यवाही करने का निश्चय किया।

 

अंतरिम सरकार

 

2 सितंबर, 1946 ई, को नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। यद्यपि वेवल के प्रयासों से मुस्लिम लीग ने अंतरिम सरकार में भाग लिया था, तथापि उसने कांग्रेस की नीतियों को सफल नहीं होने दिया। हमेशा उसके कार्य में बाधा उपस्थित करती रही। इस समय देश में पाकिस्तान की माँग को लेकर सांप्रदायिक दंगों में वृद्धि हुई।

 

लॉर्ड माउंट बेटन योजना एवं स्वतंत्रता की प्राप्ति

 

ऐसे समय में ब्रिटिश सरकार ने लॉर्ड, वेवल के स्थान पर लॉर्ड माउंट बैटन को भारत का गवर्नर जनरल नियुक्त किया, जिसने 24 मार्च, 1947 ई. को इस पद को ग्रहण किया।

 

लॉर्ड माउंट बैटन ने अनुभव किया कि मुस्लिम लीग पाकिस्तान चाहती है और कांग्रेस से उसका समझौता नितांत असंभव है। अतः उसकी दृष्टि में विभाजन के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं था। लॉर्ड माउंट बैटन ने जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल तथा महात्मा गाँधी आदि की स्वीकृति प्राप्त कर 3 जून, 1947 ई. को भारत विभाजन की योजना प्रकाशित की, जिसे माउंट बैटन योजना कहते हैं। इस योजना को क्रियांवित करने के लिए ब्रिटिश संसद ने 16 जुलाई, 1947 ई. को ‘भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम’ पारित कर दिया। यह अधिनियम 15 अगस्त, 1947 ई. को लागू हुआ। इसके अनुसार 15 अगस्त, 1947 ई को भारत को एक स्वतंत्र देश घोषित कर दिया गया, परंतु इसके साथ ही भारत का विभाजन

भी हो गया और एक नए देश पाकिस्तान का निर्माण हुआ। इस प्रकार एक लंबे संघर्ष के बाद भारत को आजादी मिली और महात्मा गाँधी का स्वप्न पूरा हुआ।

 

महात्मा गाँधी की हत्या (30 जनवरी, 1848 ई.)

 

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् मुस्लिम लीग्गू ने भारत में सांप्रदायिक दंगे भड़का दिए। परिणामस्वरूप हिंदुओं और मुसलमानों में भयंकर मारकाट हुई। महात्मा गाँधी के प्रयासों से नोआखली तथा बिहार में शांति स्थापित हुई। इसके पश्चात् उन्होंने कलकत्ता पहुँच कर 72 घंटे का उपवास किया। गाँधीजी ने इन दंगों को शांत करने के लिए हरसंभव प्रयास किए। 30 जनवरी, 1948 को जब वे दिल्ली के बिरला मंदिर की प्रार्थना सभा में उपस्थित होने जा रहे थे, तब एक हत्यारे नाथूराम गोडसे ने उन पर गोली चलाई। गोली लगते ही वे ‘हे राम’ कहते हुए धरती पर गिर पड़े और कुछ ही क्षणों में उनकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार सांप्रदायिकता के विरुद्ध संघर्ष करते हुए वे शहीद हो गए। गाँधीजी की मृत्यु पर डॉ. स्टनले जोन्स ने ठीक ही लिखा है कि, “हत्यारे ने गोलियाँ महात्मा गाँधी तथा उनके विचारों का अंत करने के लिए चलाई थीं, किंतु फल यह हुआ कि वे विचार स्वच्छंद बन गए और मानव जाति की धरोहर बन गए। मृत्यु से वह अपने जीवन की अपेक्षा अधिक बलशाली हो गए।”

 

भारत की स्वतंत्रता में सहायक तत्त्व

 

भारत की स्वतंत्रता में निम्न तत्त्व सहायक सिद्ध हुए हैं-

 

(1) गाँधीजी का योगदान

 

गाँधीजी के नेतृत्व में चलाए गए राष्ट्रीय आंदोलन ने भारत की स्वतंत्रता में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया, यद्यपि असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा भारत छोड़ो आंदोलन असफल रहे, तथापि इन आंदोलनों में राष्ट्रीय आंदोलन को जन-आंदोलन बना दिया। जनता ब्रिटिश शासन से घृणा करने लगी एवं उसमें सरकार से टक्कर लेने की भावना जागृत हुई।

 

(2) इंगलैंड की दुर्बलता

 

द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण इंगलैंड, की स्थिति काफी खराब हो गई थी। अब उसके लिए अधिक समय तक भारत पर शासन करना असंभव था। ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने स्वयं ब्रिटिश संसद में इस बात को स्वीकार किया था।

 

(3) नौ सेना का विद्रोह

 

राष्ट्रीय चेतना की लहर जनता के अतिरिक्त पुलिस और सेना में भी पहुँच चुकी थी। जब ब्रिटिश सरकार ने आजाद हिंद फौज के अधिकारियों पर मुकदमे चलाए। तब सेना में चेतना की लहर तीव्रगति से फैली। फलतः सन् 1946 में भारतीय नौ सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया, जिससे कई ब्रिटिश पदाधिकारी हताहत हुए। इससे अंग्रेज सरकार को यह स्पष्ट हो गया कि अब भारतीय नौ सैनिकों में सरकार के प्रति पहले जैसी स्वामीभक्ति नहीं है, इसलिए भारतीय सेना पर निर्भर रहकर, भारत पर शक्ति के बल पर शासन नहीं किया जा सकता है।

(4) इंगलैंड में मजदूर दल की सरकार

 

इंगलैंड का मजदूर दल भारतीय स्वतंत्रता का समर्थक था। उसने सत्ता में आने से पूर्व आम चुनावों में घोषणा की थी कि यदि उसकी सरकार बनी, तो वह भारत को आजाद कर देगा। सन् 1945 में इगलैंड में लेबर पार्टी की सरकार बनी, तो भारत की स्वतंत्रता अधिक निकट आ गई।

 

(5) सांप्रदायिक दंगों का प्रभाव

 

मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की माँग को लेकर देश में चारों ओर सांप्रदायिक दंगे करवा दिए। इन दंगों का प्रभाव पुलिस, सेना और प्रशासन में भी फैल चुका था। अब केवल मुस्लिम लीग की सहायता से ब्रिटिश सरकार के लिए भारत पर शासन करना कठिन था।

 

(6) ब्रिटेन पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव

 

अमेरिका, रूस और चीन आदि मित्र देश पिछले कई वर्षों से भारत को स्वतंत्रता देने के लिए ब्रिटेन पर दबाव डाल रहे थे। अतः इंगलैंड विश्व जनमत की अवहेलना नहीं कर सकता था। इसके लिए भारत को स्वतंत्रता देना जरूरी हो गया।

 

(7) कांग्रेस द्वारा विभाजन की योजना को स्वीकार करना

 

कांग्रेस ने इंगलैंड से शीघ्र स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए देश के विभाजन की योजना को स्वीकार कर लिया था। यदि कांग्रेस देश का विभाजन स्वीकार नहीं करती, तो मुस्लिम लीग से समझौता नहीं होता और ब्रिटिश सरकार आगामी कुछ वर्षों तक कांग्रेस और लीग के इस मतभेद का लाभ उठाकर भारत पर शासन करती रहीं। अतः कांग्रेस ने शीघ्र स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए देश का विभाजन भी स्वीकार कर लिया था।

 

(४) इंगलैंड की विवशता

 

इंगलैंड ने विवश होकर भारत को स्वतंत्रता प्रदान की। युद्ध के दौरान इंगलैंड की आर्थिक स्थिति काफी खराब हो गई थी। वह अमेरिका से भारी मात्रा में ऋण ले रहा था। युद्ध के समय भारत का ऋण भी इंगलैंड पर चढ़ गया। ऐसे समय में ब्रिटिश राजनीतिज्ञों ने यह कहा था कि इंगलैंड को भारत पर शासन करने से आर्थिक दृष्टि से नुकसान उठाना पड़ रहा है।

 

यद्यपि स्वतंत्रता प्राप्ति में कांग्रेस का महान् योगदान था, तथापि क्रांतिकारियों ने भी अपने बलिदानों के द्वारा महान् योगदान दिया था। जिस समय सरकार निरंकुश होकर जनता पर अत्याचार कर रही थी और कांग्रेसी नेताओं का मनोबल गिर चुका था। ऐसे समय में क्रांतिकारियों ने राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया तथा ब्रिटिश सरकार को ईंट का जवाब पत्थर से दिया था। इसके अतिरिक्त भारतीय समाचारपत्रों, लेखकों एवम् विद्यार्थियों ने भी स्वतंत्रता प्राप्ति में सराहनीय योगदान दिया था।

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